
राम मंदिर नगरी में भाजपा की करारी हार के लिए कई कारण बताए जा रहे हैं।
भाजपा से ओबीसी और दलितों का अलगाव, अखिलेश यादव की ठोस जातिगत समीकरण बनाने
की चाल, अयोध्या के विकास के लिए ली गई जमीन का मुआवजा न मिलने से स्थानीय लोगों में
नाराजगी कुछ कारण हैं। एक वर्ग ने भाजपा की हार को पार्टी की दिल्ली और लखनऊ इकाइयों के
बीच तनाव से भी जोड़ा।
अयोध्या में भाजपा के साथ क्या गलत हुआ
इसके अलावा, फैजाबाद भी उन सीटों में से एक है, जहां समाजवादी पार्टी के वोट बैंक के पक्ष में सबसे
मजबूत जातिगत समीकरण है। साथ ही, समाजवादी पार्टी के लिए जो बात कारगर साबित हुई, वह
यह कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर वह संविधान बदल देगी।दरअसल, भाजपा के लल्लू सिंह
ने अयोध्या में सबसे पहले कहा था कि अगर भाजपा को 400 से अधिक सीटें मिलीं तो संविधान बदल
दिया जाएगा। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे पर एक कहानी गढ़ी और आरोप लगाया कि
भाजपा संविधान में बदलाव करके पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले आरक्षण को खत्म
करना चाहती है।इस मुद्दे ने इतना तूल पकड़ा कि भाजपा पूरे चुनाव में इस पर सफाई देती रही और
अपनी बात से भटक गई। 1984 से लेकर अब तक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने फैजाबाद सीट दो
-दो बार जीती है। अयोध्या में 1991 के बाद भाजपा का दबदबा बढ़ा।कुर्मी और हिंदुत्ववादी चेहरा रहे
भाजपा के विनय कटियार ने तीन बार यहां से जीत दर्ज की, जबकि समाजवादी पार्टी के मित्रसेन
यादव 1989, 1998 और 2004 में यहां से चुने गए।2004 में भाजपा ने अपने ओबीसी चेहरे कटियार
को हटाकर लल्लू सिंह को उम्मीदवार बनाया। सिंह ने 2014 और 2019 में लगातार दो बार सीट जीती
। भाजपा ने पिछले दो चुनाव “मोदी लहर” पर सवार होकर जीते, लेकिन जैसे ही जाति मुख्य मुद्दा बनी
, पार्टी हार गई।