
नागरिकों के अधिकारों के रक्षक बन रहे नए आपराधिक कानून
प्रधानमंत्री ने कहा कि 1947 में, सदियों की गुलामी के बाद जब हमारा देश आजाद हुआ,
पीढ़ियों के इंतजार के बाद, लोगों के बलिदानों के बाद, जब आजादी की सुबह आई, तब
कैसे-कैसे सपने थे, देश में कैसा उत्साह था। उन्होंने कहा कि देशवासियों ने सोचा था कि
अंग्रेज गए हैं, तो अंग्रेजी कानूनों से भी मुक्ति मिलेगी। अंग्रेजों के अत्याचार के, उनके
शोषण का जरिया ये कानून ही तो थे। ये कानून ही तब बनाए गए थे, जब अंग्रेजी सत्ता
भारत पर अपना शिकंजा बनाए रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी। उन्होंने कहा
कि 1857 में देश का पहला बड़ा स्वधीनता संग्राम लड़ा गया। उस 1857 के स्वतंत्रता
संग्राम ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं, तब जाकर 1860 में अंग्रेज इंडियन
पीनल कोड यानी आईपीसी लाए। उसके कुछ साल बाद, इंडियन पीनल एक्ट लाया
गया यानी सीआरपीसी का पहला ढांचा अस्तित्व में आया। इस कानूनों की सोच व
मकसद यही था कि भारतीयों को दंड दिया जाए, उन्हें गुलाम रखा जाए। दुर्भाग्य
देखिए, आजादी के बाद दशकों तक हमारे कानून उसी दंड संहिता और पीनल माइंड
सेट के इर्द गिर्द ही मंडराते रहे, जिसका इस्तेमाल नागरिकों को गुलाम मानकर होता
रहा।मोदी ने कहा कि देश अब उस कोलोनियल माइंडसेट से बाहर निकले, राष्ट्र के
सामर्थ्य का प्रयोग राष्ट्र निर्माण में हो इसके लिए राष्ट्रीय चिंतन आवश्यक था।
इसलिए मैंने 15 अगस्त को लाल किले से गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का
संकल्प देश के सामने रखा था। अब भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा
संहिता के जरिए देश ने उस दिशा में एक और मजबूत कदम उठाया है। उन्होंने कहा
कि हमारी न्याय संहिता Of the People, By the People, For the People के
उस भावना को सशक्त कर रही है, जो लोकतंत्र का आधार होती है।