शिक्षा-चिकित्सा को मुनाफाखोरी से बचाने का भागवत-आह्वान

शिक्षा-चिकित्सा को मुनाफाखोरी से बचाने का भागवत-आह्वान
शिक्षा-चिकित्सा को मुनाफाखोरी से बचाने का भागवत-आह्वान
भारत में स्वास्थ्य-शिक्षा को प्रारंभ से ही सामाजिक दायित्व मानने की परंपरा रही है।
लेकिन दुर्भाग्य से आज स्कूल-कॉलेज और अस्पताल लाभ संचालित
उपक्रमों में तब्दील हो गए हैं और सेवा की बजाय धन कमाने के अड्डे बन गये हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इंदौर
के एक किफायती कैंसर अस्पताल के उद्घाटन अवसर पर जो बात कही
वह आज की सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक और नैतिक आवश्यकता को उजागर करती है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा और चिकित्सा जैसे बुनियादी क्षेत्रों
को मुनाफाखोरी से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि ये सेवा के क्षेत्र हैं,
व्यापार के नहीं। हाल के वर्षों में शिक्षा और चिकित्सा का जिस तेजी से बाजारीकरण
एवं व्यावसायीकरण हुआ है, सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र
ने इसे धन कमाने का जरिया बनाया है, वह न केवल नये समाज निर्माण
की चिन्ताओं बल्कि एक दूषित सोच को दर्शाता है।
क्योंकि उसने आम आदमी को बदहाली के कगार पर पहुंचाया है।

शिक्षा-चिकित्सा को मुनाफाखोरी से बचाने का भागवत-आह्वान

महंगी शिक्षा ने जहां अभिभावकों का बजट हिला दिया है,
वहीं चिकित्सा के नाम पर मुनाफाखोरी ने लाखों परिवारों को गरीबी
के दलदल में धकेलते हुए जरूरी चिकित्सा से वंचित किया है।
इस मर्ज की रग पर हाथ रखते हुए भागवत द्वारा दी गई चेतावनी सत्ताधीशों की आंख खोलने वाली है।

भारत में स्वास्थ्य-शिक्षा को प्रारंभ से ही सामाजिक दायित्व मानने की परंपरा रही है।

लेकिन दुर्भाग्य से आज स्कूल-कॉलेज और अस्पताल लाभ संचालित

उपक्रमों में तब्दील हो गए हैं और सेवा की बजाय धन कमाने के अड्डे बन गये हैं।

आज निजी क्षेत्र के साथ-साथ सरकारों की मानसिकता भी धन-केन्द्रित होती जा रही है

जिससे आमजन को सस्ते एवं किफायती शिक्षा एवं चिकित्सा

के साधन-सुविधाएं सुलभ नहीं हो रही है।

मुनाफाखोरी की अंतहीन लिप्सा ने कथित गुणवत्ता वाले

स्कूलों व अस्पतालों को आम आदमी की पहुंच से दूर किया है।

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