लोगों में परजीवी के रूप में जीने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है

बलांगीर- ओडिशा *(मंगल भावना कार्यक्रम)*
संयमी को दान देना धर्म*मुनि रमेश कुमार

निधि मीडिया न्यूज बलांगीर ओडिशा

आचार्य भिक्षु ने दान और संपत्ति के साथ विभाजन की अवधारणाओं के बीच अंतर किया है।

वह दान का पात्र है, अधिकारी है जिसके पास संयम है। जो अपने लिए खाना नहीं बनाता,

जिसके पास कुछ भी नहीं है, जिसने अपनी सारी संपत्ति का त्याग कर दिया है,

जो आत्म-साक्षात्कार में डूबा हुआ है और जो अनासक्त है।

उसे दान देना धर्म है। सब धर्मों में दया और दान को सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है।

लोगों में परजीवी के रूप में जीने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है

इन दोनों की अवधारणा स्पष्ट होनी चाहिए। उपरोक्त विचार आचार्य श्री महाश्रमण के सुशिष्य

मुनि रमेश कुमार ने बलांगीर स्थित तेरापंथ भवन में आयोजित मंगल भावना

कार्यक्रम में व्यक्त किये। मुनि रमेश कुमार ने अपने बलांगीर प्रवास में

महाभारत के शांतिपर्व के श्लोकों का विशलेषण करते हुए प्रवचन किया।

मुनि रमेश कुमार ने आगे कहा- पंच महाव्रतधारी साधु धर्म का पालन करते हैं

इसलिए उन्हें जो दान दिया जाता है वह सुपात्र दान कहलाता है। दान के

दो भेद किये गये है लौकिक और लोकोत्तर। समाज एवं प्राणीमात्र के प्रति

अपने कर्तव्यों का पालन भी करते हैं, वह दान लौकिक कहलाता है।

दान की महिमा तभी होती है, जब वह नि:स्वार्थ भाव से दिया जाता है।

अगर कुछ पाने की लालसा में दान किया जाए तो वह व्यापार बन जाता है।

लोगों में परजीवी के रूप में जीने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है

मुनि रत्न कुमार जी ने भी अपने प्राग् वक्तव्य में सभी को धार्मिक जीवन जीने की प्रेरणा दी।

इससे पूर्व मंगल भावना कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती श्वेता जैन के सुमधुर मंगल

गीत द्वारा शुरूवात हुई। बलांगीर तेरापंथ सभा के अध्यक्ष श्रीमान ध्रुव कुमार

जैन, संगठन मंत्री संजीव कुमार जैन एवम महिला मंडल की अध्यक्षा श्रीमती

ममता जैन ने अपनी मंगल भावना व्यक्त की। मंच संचालन उड़ीसा प्रांतीय

सभा के उपाध्यक्ष श्रीमान मनोज जैन ने सुचारु रुप से

किया एवं मुनीश्री जी के प्रति अपनी मंगल भावना व्यक्त की।

रीना गोयल बलांगीर ओडिशा

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