
राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार बनेगा राम मंदिर
रामजन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है
दुनिया के किसी देश में यह संभव नहीं है उसके आराध्य इतने लंबे समय तक मुकदमों
का सामना करें। किंतु यह हुआ और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत के लोकतंत्र,
उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है
जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। विदेशी आक्रांताओं का मानस क्या रहा होगा,
कहने की जरूरत नहीं है। किंतु हर भारतवासी का राम से रिश्ता है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है।
वे हमारे प्रेरणापुरुष हैं, इतिहास पुरुष हैं और उनकी लोकव्याप्ति विस्मयकारी है।
राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार बनेगा राम मंदिर
ऐसा लोकनायक न सदियों में हुआ है और न होगा। लोकजीवन में, साहित्य में,
इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शनकलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं।
राम शब्द संस्कृत की ‘रम’ क्रीड़ायाम धातु से बना है अर्थात हरेक मनुष्य के अंदर रमण करने वाला जो
चैतन्य-स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान है, वही राम है। राम को शील-सदाचार, मंगल-मैत्री,
करुणा, क्षमा, सौंदर्य और शक्ति का पर्याय माना गया है। कोई व्यक्ति सतत साधना के द्वारा
अपने संस्कारों का परिशोधन कर राम के इन तमाम सद्गुणों को अंगीकार कर लेता है,
तो उसका चित्त इतना निर्मल और पारदर्शी हो जाता है कि उसे अपने अंत:करण में राम
के अस्तित्व का अहसास होने लगता है।
अपनी ज्ञानेंद्रियों को मर्यादापूर्वक सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है
कदाचित राम, दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। संस्कृत में दशरथ का अर्थ है- दस रथों का मालिक।
अर्थात पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों का स्वामी। कौशल्या का अर्थ है- ‘कुशलता’।
जब कोई अपनी कर्मेंद्रियों पर संयम रखते हुए, उसका चित्त स्वाभाविक रूप से राम में रमने लगता है।
पूजा-अर्चना की तमाम सामग्रियां उसके लिए गौण हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति का
व्यक्तित्व इतना सहज और सरल हो जाता है कि वह जीवन में आने वाली तमाम
मुश्किलों का स्थितप्रज्ञ होकर मुस्कुराते हुए सामना कर लेता है। भारतीय जनमानस
में राम का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं,
बल्कि उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने उन तमाम कठिनाइयों का सामना
बहुत ही सहजता से किया। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी इसलिए कहते हैं,
क्योंकि अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने स्वयं को बेहद गरिमापूर्ण रखा।