श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है
यह शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। ब्रह्म पुराण (उपर्युक्त उद्धृत), मरीचि एवं बृहस्पति की
परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है।
श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या
पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है,
वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।
स्कंद पुराण का कथन है कि ‘श्राद्ध’ नाम इसलिए पड़ा है कि
उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि
इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।
श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है
ॠग्वेद में श्रद्धा को ‘देवत्व’ नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने
धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा
कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं
जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है।
श्राद्ध महिमा में कहा गया है- ‘आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च।
प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।’ – अर्थात जो लोग
अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट
होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है,
उन्हें देवतुल्य माना जाता है। ‘पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:’ –
अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- ‘श्रद्धा।’ श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है
और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र
चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए।
यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है।
इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है।
मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर,
मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है।
श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है
उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है।
यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।
‘क्या फायदा?’ वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार
की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार,
आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतज्ञ होता है
और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकारस्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले,
तब तक उसे आंतरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है।
उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र
की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं,
समय, धन, श्रमदान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं।
उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म-परंपरा में श्राद्ध-कर्म की महत्ता बताई गई है।
सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की
स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी संपन्न किया जा सकता है।
यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी?
पहुंचती तो केवल श्रद्धा है। मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं?
इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- ‘होता है, अवश्य होता है।’
संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है।
विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा,
जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है, अन्य समस्त आत्माओं से संबद्ध है।
संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं
तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है।