
हिमाचल के राज्यपाल ने किया नीरजा माधव की तीन पुस्तकों का लोकार्पण
अपने लेखकीय संबोधन में डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि राष्ट्रवाद के अस्तित्व में
आए बिना व्यक्ति मानवतावादी नहीं हो सकता और इस प्रकार अंतरराष्ट्रवादी भी
नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद किसी भी देश के नागरिकों की अपने देश के प्रति एक
रागात्मक भावना है, जो उसे उसी तरह उत्तराधिकार में मिली होती है जैसे उसके
देश के प्राकृतिक संसाधन, संस्कृति, परंपराएं आदि मिली होती हैं। 21वीं सदी
आते-आते कुछ थोड़े से वक्रपंथियों द्वारा राष्ट्रवाद को संकीर्ण और सांप्रदायिक
रूप देने की कोशिशें की जाने लगीं, तब मन में आया कि राष्ट्रवाद का मूल स्वरूप
नई पीढ़ियों और समाज के सामने आना चाहिए। उसी का परिणाम है- अर्थात्
राष्ट्रवाद।कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. राम सुधार सिंह ने कहा कि जैसे गंगोत्री
से निकलती हुई गंगा पहाड़ों में विविध नामो से प्रवाहित होती हुई मैदानी भाग
को हरीतिमा प्रदान करती है, किंतु उसका लक्ष्य तो अनंत महासागर होता है।
उसी प्रकार नीरजा जी के साहित्य का उत्स कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध
जैसी विविध विधाओं के रूप में एक बड़े पाठक वर्ग को आनंद प्रदान करता है
किंतु सभी का लक्ष्य राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चिंतन के साथ अपने साहित्य
की प्रत्येक धारा को इस महान राष्ट्र की अस्मिता को समर्पित कर देना है।
नीरजा जी के लेखन प्रक्रिया का कैनवास बहुत बड़ा है। अपने कथा साहित्य
में वे उन विषयों को उठाती हैं जो प्राय: अब तक अछूते रहे हैं। यमदीप, गेशे
जम्पा जैसे उपन्यासों के साथ उनकी तमाम कहानियां इसके प्रमाण हैं।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चिंतन के संबंध में डॉ माधव की अपनी स्पष्ट दृष्टि है।