आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री मोदी?

आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री मोदी?
आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री मोदी?
मसलन, यहां पर सवाल भूमि के किसी कब्जाए हुए टुकड़े या सांप्रदायिक
मिजाज पर वर्चस्व की मानसिकता का नहीं है
बल्कि उन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक-प्रशासनिक फैसलों से जुड़ा हुआ है
जिसकी कीमत हमारे वीर जवानों और आम आदमियों को चुकानी पड़ती है।
जब भी हमारे देश का कोई प्रधानमंत्री चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश
जैसे शत्रु देशों से वैश्विक कूटनीति के नाम पर प्रेम और भरोसे के पींगे बढ़ाना चाहता है
या फिर नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार या तिब्बतियों
पर भारतीयों की गाढ़ी कमाई लुटाता है तो मेरे मन में एक ही
सवाल पैदा होता है कि हमारे इन नेताओं को इतिहास का ज्ञान नहीं है
या फिर भौगोलिक सच्चाई से ये नादान हैं।
क्या इन्हें उन वीर जवानों और साम्प्रदायिक दंगा, आतंकवाद, नक्सलवाद
संगठित अपराध की भेंट चढ़े आमलोगों व सुरक्षा कर्मियों के चेहरे याद नहीं आते
उनकी विधवाओं और बच्चों, वृद्ध माता पिता आदि की याद नहीं आती
जिनकी असमय मौत का एकमात्र कारण चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश
या इनका रिंग मास्टर अमेरिका की विध्वंसक नीतियां रही हैं।

आखिरकार दगाबाज चीन पर भरोसा करके फिर चोट खाने के रिस्क क्यों उठा रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री मोदी?

मसलन, यहां पर सवाल भूमि के किसी कब्जाए हुए

टुकड़े या सांप्रदायिक मिजाज पर वर्चस्व की मानसिकता का नहीं है

बल्कि उन दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक-प्रशासनिक फैसलों से जुड़ा हुआ है

जिसकी कीमत हमारे वीर जवानों और आम आदमियों को चुकानी पड़ती है।

जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने कहा था

कि हम इतिहास बदल सकते हैं, लेकिन भूगोल नहीं

के बारे में सिर्फ इतनी सी दलील देना चाहूंगा कि आप इतिहास

और भूगोल को यथावत रहने दीजिए

बस अपने राजनीति विज्ञान के विषय वस्तु बदल दीजिए।

यहां पर मैं यह समझ सकता हूँ कि हमारे कतिपय असरदार पर गद्दार

नेताओं-अधिकारियों-उद्योगपतियों की तिकड़ी ने क्षणिक

लाभवश अदूरदर्शिता दिखाते हुए अमेरिकी दबाव में भारतीय

अर्थव्यवस्था को चीनी अर्थव्यवस्था पर निर्भर बना दिया।

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