
लाल किला अटैक केस क्या है
आरिफ को हमले को अंजाम देने के लिए अन्य आतंकवादियों के साथ साजिश रचने का दोषी पाया गया, ट्रायल
कोर्ट ने अक्टूबर 2005 में उसे मौत की सजा सुनाई। दिल्ली उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट ने बाद की अपीलों
में फैसले को बरकरार रखा। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि लाल किले पर हमले की साजिश श्रीनगर में दो साजिशकर्ताओं
के घर पर रची गई थी, जहां आरिफ ने 1999 में तीन अन्य लश्कर आतंकवादियों के साथ अवैध रूप से प्रवेश किया
था। तीन आतंकवादी – अबू शाद, अबू बिलाल और अबू हैदर – जो स्मारक में घुस गए थे, अलग-अलग मुठभेड़ों में
मारे गए। समीक्षा और उपचारात्मक याचिकाओं सहित कई कानूनी चुनौतियों के बावजूद, आरिफ की दया याचिका
खारिज कर दी गई, जो अपराध की गंभीरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे को उजागर करती है।
जब लाल किले में घुसे थे लश्कर के 6 आतंकी
दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर 2007 में ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की थी। इसके बाद आरिफ ने हाई कोर्ट के
फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत ने अगस्त 2011 में भी उसे दी गई
मौत की सजा देने के आदेश का समर्थन किया था। बाद में उनकी समीक्षा याचिका सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों
की पीठ के सामने आई, जिसने अगस्त 2012 में इसे खारिज कर दिया। जनवरी 2014 में एक सुधारात्मक याचिका
भी खारिज कर दी गई। उसके बाद, आरिफ ने एक याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि इससे उत्पन्न होने वाले
मामलों में समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं। मौत की सज़ा की सुनवाई तीन जजों की बेंच और खुली अदालत में हो।