
जानिए इस दिन के महत्व और इतिहास के बारे में
जमीन का वह हिस्सा जहां पानी और भूमि आपस में मिलते हैं उसे वेटलैंड कहा जाता है। ऐसी
जमीन जो सालभर या साल के ज्यादातर महीने जल से भरी रहती है। वेटलैंड या आर्द्रभूमि की
मिट्टी किसी झील, नदी, तालाब के किनारे का वह हिस्सा है जहां बहुत ज्यादा मात्रा में नमी पाई
जाती है। ये कई मायनों में बहुत फायदेमंद होती है। हर साल 2 फरवरी को वर्ल्ड वेटलैंड डे मनाए
जाने का उद्देश्य उन आर्द्र क्षेत्रों पर प्रकाश डालना है, जो विलुप्त होने की कगार पर हैं।झीलों,
तालाबों, नदियों आदि की खराब होती स्थिति को देखते हुए 2 फरवरी 1971 में ईरान के रामसर
में वेटलैंड कन्वेंशन को अपनाया गया था। इसलिए इस दिन को पूरी दुनिया में विश्व आर्द्रभूमि
दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1975 में इस कन्वेंशन को लागू किया गया था और पहली
बार वर्ल्ड वेटलैंड डे 2 फरवरी 1997 में मनाया गया था। तो वहीं, भारत ने 1 फरवरी 1982 में
इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे।रामसर स्थल ऐसे वेटलैंड्स हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय महत्व
प्राप्त हैं। इन्हें यूनेस्कों की रामसर कन्वेंशन के तहत लिस्ट किया जाता है। ओडिशा की चिल्का
झील भारत का सबसे पहला रामसर स्थल है। 2021 में भारत की 4 और आर्द्रभूमियों को रामसर
स्थल की सूची में शामिल किया गया था। विश्व में कुल 2400 से अधिक स्थलों को रामसर स्थल
के रुप में मान्यता प्राप्त हैं। आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में बहुत ही महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते हैं। ये कई जलीय जीव, जंतुओं का आवास होते हैं। इतना ही नहीं ये प्रवासी पक्षियों
के रहने के भी अनुकूल होते हैं। इनके लुप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी चीज़ों को भारी
नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका संरक्षण बहुत जरूरी है।