
नई दिल्ली। दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेन्द्र सचदेवा एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष
विजेन्द्र गुप्ता ने आज एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा की दिल्ली में स्वास्थ सेवाएं पूरी
तरह चरमर्रा चुकीं हैं, चालू अस्पताल हों या निर्माणाधीन या फिर इनकी मोहल्ला क्लीनिक
सब भ्रष्टाचार के सेंटर बन गए हैं। सचदेवा ने कहा हमारे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजेन्द्र
गुप्ता ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ विभाग के घोटालों की शिकायत ए.सी.बी. में की थी,
अब उस पर एफ.आई.आर. होने जा रही है अब केजरीवाल के काले सच सामने आयेंगे।
सचदेवा ने कहा की सौरभ भारद्वाज हों या केजरीवाल के अन्य मंत्री यह सब प्रेस कॉन्फ्रेंस
के मंत्री हैं इनका प्रशासन से कुछ लेना देना नही है। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने कहा है कि
मंत्री सौरभ भारद्वाज एवं केजरीवाल सरकार के मंत्री जिनके स्वास्थ विभाग के सभी
प्रोजेक्ट विलम्ब से चल रहे हैं जिम्मेदारी लें इस्तीफा दें। दिल्ली सरकार के नये अस्पतालों
के निर्माण की तो छोड़िए जिन अस्पतालों का अपग्रेडेशन होना है वह भी वर्षों के
विलंब से चल रहे हैं।
दिल्ली में स्वास्थ सेवाएं पूरी तरह चरमर्रा चुकीं हैं
सचदेवा ने कहा है की दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक एवं उनके डाक्टरों के प्रति पेशंट बिल, पैथोलॉजी
टेस्ट एवं एक्स रे आदि सब भ्रष्टाचार के विषय बन चुके हैं और उनकी जांच चल रही है। ऐसे स्कैम
बिना मंत्री एवं मुख्य मंत्री की मौन स्वीकृति के सम्भव नही है। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष ने कहा है
की सौरभ भारद्वाज एवं उनके पूर्ववर्ती स्वास्थ मंत्री जवाब दें उन्होने आवश्यक दवाओं की लिस्ट
बनाने एवं सभी तरह के अस्पताल प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए क्या किया।प्रेस कॉन्फ्रेंस में
भाजपा नेता विजेन्द्र गुप्ता ने आप द्वारा दिल्ली के स्वास्थ्य तंत्र की सुनियोजित लूट पर तीखा
हमला बोला। अधूरी अस्पताल इमारतों के कंकाल से लेकर मोहल्ला क्लीनिक के रूप में छिपे
हुए घोस्ट क्लीनिक तक, भाजपा नेताओं ने दावा किया कि दिल्ली के गिरते हुए स्वास्थ्य ढांचे
की हर ईंट भ्रष्टाचार से सीमेंट की गई है।प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता ने कई
मिसमैनेजमेंट और भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किया। उन्होंने बताया कि 24 स्वीकृत
अस्पताल परियोजनाओं में से, जिनकी कुल लागत 5,590 करोड़ रुपये है, कई अभी तक अधूरी
हैं और उनमें महत्वपूर्ण लागत से अधिक खर्च हुआ है। एक स्पष्ट उदाहरण 7 आईसीयू
अस्पतालों का मामला है, जिनमें 6,800 बिस्तर हैं और जिन्हें 1,125 करोड़ रुपये की लागत
पर स्वीकृत किया गया था, लेकिन तीन साल बाद भी वे केवल 50% पूरे हुए हैं।