देश में दवा कंपनियों का एक नेक्सस बन गया है
भारत और दुनिया की दवा कंपनियों ने जाल बुना है कि आदमी आम हो या खास ,
इनके चंगुल से निकल ही न पाए बाकी मेहरबानी डाक्टरों की है
देश में दवा कंपनियों का एक नेक्सस बन गया है , जिसमें अब माफिया भी आ घुसा है
प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों के माध्यम से भारत सरकार
ने सस्ती दवाओं की एक मुहिम शुरू की थी
दुनिया की दवा कंपनियों ने इतना कसा हुआ जाल बुना है
जिसे तारपीडो करने का प्रयास दवा माफिया बार बार कर रहा है
सौभाग्य का विषय है कि देश की पढ़ी
लिखी पीढ़ी खासी संख्या में जन औषधियां इस्तेमाल करती है
परन्तु चिकित्सकों और दवा कंपनियों का घालमेल
उस आम गरीब आदमी को जैनरिक दवाओं
के प्रयोग से रोकता है , जिसे सस्ती दवाओं की भारी जरूरत है
यह दवा माफिया मरीजों को जैनरिक दवा लेने से रोकता है
और महंगी दवाएं जरूरत बेजरूरत खाने के लिए मजबूर करता है
मेडिकल स्टोर्स,दवा कंपनियों और चिकित्सकों ने मिलकर आम आदमी का क्या हाल बना दिया ,
यह एक जीन थेरेपी है जो ‘हीमोफ़ीलिया बी’ बीमारी के इलाज़ के लिए दी जाती है.
‘हीमोफ़ीलिया बी’ बहुत अनजान लेकिन बहुत ख़तरनाक बीमारी है जो खून के जमने को मुश्किल बना देती है.
इसे बनाने वाली कंपनी सीएसएल बेहरिंग ने
दुनिया की दवा कंपनियों ने इतना कसा हुआ जाल बुना है
अमेरिका में इसकी एक डोज़ की क़ीमत 35 लाख डॉलर (क़रीब 28.84 करोड़ रुपये) तय की है.
इसकी वजह से यह दुनिया की सबसे महंगी दवा बन गई है.
क़रीब चालीस हज़ार लोगों में एक इंसान को ‘हीमोफ़ीलिया बी’ बीमारी होती है.
ये बीमारी पुरुषों में अधिक होती है क्योंकि अधिकांश महिलाओं में इसके लक्षण नहीं पाए जाते.
हीमोफ़ीलिया दो प्रकार का होता है ए और बी. ये जेनेटिक कोड में गड़बड़ी के चलते होता है.
चीन की अर्थव्यवस्था घट रही है, इससे चीनी रियल एस्टेट कंपनियां और चीन की
आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। माइक्रोप्लाज्मा निमोनिया और ग्लाइसेंड थेरेप्यूटिक्स
जैसी बीमारियाँ चीन को परेशान कर रही हैं। चीन के बजाए भारतीय मैन्युफैक्चरिंग
कंपनियां चीनी कंपनियों के साथ काम करने में रुचि दिखा रही हैं। भारत में चीन से निवेश बढ़ रहा है।