
प्रतिबंध के बावजूद आखिर कैसे हो रही थी Rat Hole Mining
सवाल उठता है कि जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 2014 में ‘रैट-होल खनन’ पर प्रतिबंध लगा दिया
था। तब भी यह खदान कैसे चल रही थी? वैसे इस तरह की रिपोर्टें हैं कि पूर्वोत्तर में अभी भी इस खतरनाक
तरीके से कोयला निकाला जाता है। हम आपको बता दें कि रैट-होल खनन कोयला निकालने की एक विधि है।
जैसे चूहे का बिल होता है उसी तरह एक व्यक्ति के उतरने लायक जगह बनाकर खदान में प्रवेश किया जाता है।
एक बार गड्ढा खोदने के बाद खनिक कोयले की परतों तक पहुंचने के लिए रस्सियों या बांस की सीढ़ियों का
उपयोग करके नीचे उतरते हैं। फिर कोयले को फावड़े और टोकरियों जैसे आदिम उपकरणों का उपयोग करके
मैन्युअल रूप से निकाला जाता है। कुएं से बाहर निकलने में कामयाब रहे श्रमिकों ने मीडिया को बताया था
कि कुआं 300 फीट गहरा था और इसमें कई होल बनाये गये थे। कई बार ऐसी खदानों में मज़दूरों को क्रेन की
मदद से लोहे के बक्सों में बिठा कर कुएं के अंदर ले जाया जाता है। कोयला काटने वाले मजदूर अपने सिर पर
लगी बैटरी चालित लाइट का उपयोग करते हैं और अंदर संचार के लिए वॉकी टॉकी का भी उपयोग करते हैं।
असम में जो हादसा हुआ है उसके बारे में मजदूरों ने बताया है कि संभवत: एक शाफ्ट खोदने और पास के कुएं
से टकराने के कुछ ही मिनटों में कुएं में पानी भर गया, जिसमें शायद पहले से ही पानी भरा हुआ था।बहरहाल,
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने मामले की जांच के आदेश दिये हैं।