
बंगाल में जिद और जुनून का प्रतीक हैं ममता बनर्जी
कम उम्र में ही ममता बनर्जी की रुचि राजनीति में जागी तो वह कांग्रेस से जुड़ गईं। इस दौरान वह
महिला कांग्रेस और फिर अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव बनीं। फिर साल 1975 में
ममता को बंगाल में इंदिरा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। साल 1978 में वह कलकत्ता
दक्षिण जिला कांग्रेस कमेटी की सचिव बनीं और साल 1984 में वह पहली बार कलकत्ता दक्षिण
सीट से जीत हासिल कर लोकसभा पहुंची। इस तरह से वह तब 8वीं लोकसभा में देश की सबसे
कम उम्र की सांसद थीं।साल 1991 में जब ममता दोबारा सांसद बनीं तो उनको केंद्रीय मानव
संसाधन विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया। यह वही समय था, जब ममता ने फिर कभी
पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1996 में वह दोबारा लोकसभा पहुंची और साल 1997 में कांग्रेस और
ममता की राहें जुदा हो गईं। ममता ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम से नई पार्टी बनाई,
जो वर्तमान समय में बंगाल में सरकार चला रही है।राजनीति में आने का ममता बनर्जी का एक ही
लक्ष्य था। उन्होंने बंगाल की सत्ता पर कई दशकों से काबिज वाम दलों को उखाड़ फेंकना। इस
संघर्ष के दौरान 16 अगस्त 1990 को ममता बनर्जी पर एक हमला हुआ। जिसके कारण उनको एक
महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। वहीं 1993 में उन्होंने फोटो युक्त वोटर आईडी की मांग कर दी।
जिसकी वजह से कलकत्ता में स्थित बंगाल सरकार के सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग की तरफ मोर्चा
निकाल रही थीं।