खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं
अब न कोई खुरचण खाता है न मळाई,
एक दिन से ज्यादा कहाँ रुकता है अब जमाई ।
वो झूलता छींका और वो जिमावणी,
बीती बात हो गई अब वो मिट्टी की कढावणी ।
देखते देखते न जाने क्या क्या बदल गया,
उखळ-मूसळ, चंगेरी, कुंडा तो गायब ही हो गया।
संस्कृति की सुंदर झलक पुरानी बात हो गई
अब न इण्डि मिलती है न पिढी,
बहुत सारी चीजों का नाम तक नहीं जानती है नई पीढ़ी।
छप्पर की बाती में चहचहाती चिड़िया न जाने कहाँ उड़ गई,
मोबाइल आते ही दादा-दादी की कहानी भी खो गई।
हथचक्की, देगची, घीळडी सब पुरानी बात हो गई,
कुकर आते ही रसोई की खुशबू भी चली गई।
‘कृष्ण’ याद कर न हो उदास कुछ नहीं है अब तेरे हाथ,
आदमी भी तो बदल गए हैं अब वक्त के साथ
भारती संस्कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग-अलग
भारती संस्कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग-अलग है।
यहाँ के लोग अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं, अलग-अलग तरह के कपडे़ पहनते हैं,
भिन्न-भिन्न धर्मों का पालन करते हैं, अलग-अलग भोजन करते हैं
किंतु उनका स्वभाव एक जैसा होता है।
चाहे कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं,
संस्कृति की सुंदर झलक पुरानी बात हो गई
एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्यौहार या एक आयोजन
किसी घर या परिवार के लिये समिति नहीं है। पूरा समुदाय या
आस-पड़ोस एक अवसर पर खुशियाँ मनाने में शामिल होता है,
इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल-जोल का आयोजन है,
जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है।
चाहे उनकी संस्कृति या फिर धर्म का मामला क्यों न हो।
इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
