
भारत की एकता-अनेकता, खंडन-मंडन-विखंडन, रसता-समरसता, श्रेय-हेय, उत्कर्ष
निष्कर्ष, सफलता-असफलता, सबलता-निर्बलता आदि-आदि जैसे सभी तत्व हमारी
जाति व्यवस्था के सुफलित होने पर ही निर्भर करता है।
पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा बाईस अप्रैल के पहलगाम अटैक के बाद कुछ लोग
कह रहे थे कि यह देश का ध्यान बाँटने का केंद्र सरकार का प्रयत्न है। वस्तुतः जाति
आधारित जनगणना की घोषणा का यदि कोई देवयोग था, तो वह पाकिस्तान पर
भारतीय हमले की यह पूर्वसंध्या ही थी। यह देश को एक करने, एक रखने, एक दिशा में
बढ़ाने का सर्वाधिक सटीक समय है। अब राष्ट्रीय संकट के इन दिनों, महीनों या वर्षों में
हम जातिगत गणना भी करेंगे और सभी जातियाँ एकात्म होकर भारतीय सेना के संग
खड़ी भी दिखेंगी। यही है नया भारत।
मूल बात- “संघ का दृष्टिकोण- यदि, जातिगत जनगणना का उद्देश्य न्याय और कल्याण है
, तो समर्थन है; यदि इसका उद्देश्य राजनीति और समाज को बांटना है, तो उसका सदैव ही विरोध है
सिंदूर के ठीक पूर्व जाति जनगणना- नीलकंठाय
भारत की एकता-अनेकता, खंडन-मंडन-विखंडन, रसता-समरसता, श्रेय-हेय, उत्कर्ष-निष्कर्ष
सफलता-असफलता, सबलता-निर्बलता आदि-आदि जैसे सभी तत्व हमारी जाति व्यवस्था
के सुफलित होने पर ही निर्भर करता है। जाति व्यवस्था के उत्कृष्ट प्रयोग से हम हमारे देश
संगठन का समुत्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं तो निकृष्ट उपयोग से हम रसातल में भी जा सकते
हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारतीय जाति व्यवस्था को लेकर यही राय रही है। इस राय के
अनुरूप ही आरएसएस भारतीय जाति व्यवस्था पर समय-समय पर प्रयोग-अनुप्रयोग
करता है और करता रहेगा।
अपनी सौ वर्षों की यात्रा में संघ का यह जाति विमर्श देश के समक्ष प्रामाणिकता
से स्पष्ट व स्थापित है। इस अवसर पर आरएसएस सौ वर्षीय प्रामाणिक जातीय
दृष्टिकोण निश्चित ही देश को इस निर्णय की व्यापक पूर्व अध्ययन जनित
पीठिका का आभास देता है। “संघ जो करेगा ठीक ही करेगा”, आज देश का
जनमानस ऐसा सोचने की सुलभ-सहज स्थिति में है। यह सब एकाएक नहीं हुआ है
यह संघ की शतवर्षीय अनथक, अनवरत यात्रा से उपजा तपोबल है। जनता
स्पष्टतः जानती है, यदि भाजपा ने जातिगत गणना में तनिक भी राजनैतिक
दृष्टिकोण रखा तो सर्वप्रथम संघ ही उसे रोकेगा।