
10 बिल रोके जाने को SC ने बताया अवैध
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को ऐसे मामलों में कोई
विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है और वह मंत्रिपरिषद की सहायता और
सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य है। पीठ ने कहा कि राज्यपाल
अनिश्चित काल तक स्वीकृति को रोक नहीं सकते हैं और न ही प्रभावी
रूप से पूर्ण वीटो या पॉकेट वीटो का प्रयोग कर सकते हैं। फैसले के
अनुसार, एक बार जब विधानसभा द्वारा विधेयक पारित कर दिया
जाता है और दूसरी बार राज्यपाल को भेजा जाता है, तो राज्यपाल
के लिए एकमात्र संवैधानिक कार्यवाही यह है कि वह या तो उस पर
स्वीकृति दे। या तो दुर्लभ मामलों में यदि विधेयक अपने पहले
संस्करण से काफी भिन्न है, तो स्वीकृति को रोक ले। इसे फिर
से राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने की अनुमति नहीं है।
न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद, सभी 10 लंबित विधेयक अब
स्वीकृत हो गए हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर
महादेवन की बेंच ने कहा कि राज्यपाल द्वारा इन 10 विधेयकों
को राष्ट्रपति के पास भेजना अवैध और मनमाना है। यह कार्रवाई
रद्द की जाती है। राज्यपाल की सभी कार्रवाई अमान्य है। बेंच ने
कहा कि राज्यपाल रवि ने भले मन से काम नहीं किया। इन बिलों
को उसी दिन से मंजूर माना जाएगा, जिस दिन विधानसभा ने
बिलों को पास करके दोबारा राज्यपाल को भेजा गया था।