
हम आपको बता दें कि ट्रंप–पुतिन वार्ता ने पहली बार यह संकेत दिया था
कि मॉस्को और वॉशिंगटन “लेन-देन आधारित समझ” की ओर बढ़ सकते हैं।
Modi-Putin Meeting सफल रही या Alaska में Trump-Putin Meeting सफल रही थी?
पुतिन ने इस वार्ता को सकारात्मक बताते हुए उम्मीद जताई थी
कि यह यूक्रेन विवाद के दीर्घकालिक समाधान का आधार बन सकती है।
किंतु इस बातचीत का दायरा सीमित रहा, मुख्यतः नाटो के विस्तार को रोकने
और प्रतिबंधों में ढील जैसे मुद्दों पर। देखा जाये तो अलास्का मीटिंग के दौरान ट्रंप
की शैली व्यावहारिक और समझौता आधारित अवश्य रही थी
लेकिन उसमें वैश्विक शांति के नैतिक तर्क कम और शक्ति-राजनीति के समीकरण अधिक थे।
दूसरी ओर, मोदी–पुतिन मुलाकात ने एक अलग छवि प्रस्तुत की।
मोदी ने खुले तौर पर संघर्षविराम और मानवीय आधार पर शांति-स्थापना की वकालत की।
उन्होंने रूस के राष्ट्रपति को यह भी याद दिलाया
कि युद्ध का दीर्घकालिक समाधान केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि वार्ता और सहयोग से संभव है।
मोदी का दृष्टिकोण महज भू-राजनीतिक हितों तक सीमित नहीं था
बल्कि उन्होंने इसे “मानवता की जिम्मेदारी” कहा।
यह संदेश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए कहीं अधिक व्यापक और स्वीकार्य है।