
Waqf Amendment Bill पर Supreme Court के अंतरिम फैसले में छिपा है संतुलन और संवैधानिकता का संदेश
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वक़्फ़ परिषदों और बोर्डों
में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या सीमित रहनी चाहिए।
केंद्रीय वक़्फ़ परिषद में चार से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य न हों
और राज्य स्तर पर भी इसी प्रकार की सीमा लागू हो।
देखा जाये तो यह निर्णय एक संवेदनशील धार्मिक संस्था के चरित्र को बनाए
रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना
कि प्रशासनिक दृष्टि से गैर-मुस्लिम को सीईओ बनाना
पूरी तरह असंवैधानिक नहीं है, लेकिन “जहाँ तक संभव हो”
मुस्लिम सीईओ की नियुक्ति ही की जानी चाहिए।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रावधान पर रोक लगाई,
जिसके तहत सरकार किसी भूमि विवाद के दौरान वक़्फ़ संपत्ति
को डिरेकोग्नाइज़ कर सकती थी।
यह प्रावधान ‘separation of powers’ (शक्तियों का पृथक्करण)
के सिद्धांत के विरुद्ध माना गया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संपत्ति का अधिकार और स्वामित्व तय करने
का अधिकार केवल न्यायाधिकरणों और अदालतों का है
न कि कार्यपालिका का। साथ ही यह भी निर्देश दिया
कि जब तक विवाद का अंतिम निपटारा नहीं होता
तब तक वक़्फ़ भूमि पर कोई तृतीय पक्ष अधिकार न बनाया जाए।