
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और डेवलपर्स पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
हिमाचल में 174 छोटे-बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स हैं
जो 11,209 मेगावाट बिजली पैदा करते हैं।
इन प्रोजेक्ट्स के लिए पहाड़ों को काटा जाता है।
लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारों से यह अपेक्षा की जाती है
कि सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए दूरदृष्टि के साथ दूरगामी विकास को सिरे चढ़ाया जाए।
इसके विपरीत नेताओं को सिर्फ वोट बैंक की चिंता है।
इसके लिए तात्कालिक विकास की नीतियों के फायदे के लिए
लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के साथ ही पर्यावरण के विनाशकारी प्रभावों की अनदेखी करना आम है।
यही वजह है कि हिमाचल सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ी लताड़ लगाई है।
कोर्ट ने कहा कि अगर अनियंत्रित विकास और पर्यावरण
को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां नहीं रोकी गईं
तो एक दिन पूरा हिमाचल नक्शे से गायब हो सकता है।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हिमाचल में बदलते पर्यावरण को लेकर चिंताएं
बढ़ती जा रही हैं और विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं।
वोट बैंक लालच ने बर्बाद किया हिमाचल-उत्तराखंड को
सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के अगले ही दिन उत्तराखंड के चमोली
में चमोली जिले में हेलंग के समीप निर्माणाधीन एक हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट साइट
के पास पहाड़ एक बार फिर से ढहकर धड़ाम से नीचे गिर गया।
इस हादसे में कंपनी के 8 मजदूर घायल हो गए।
साइट पर हादसे के वक्त करीब 300 मजदूर थे।
जहां पर लैंडस्लाइड हुआ वहां पर 70 के करीब मजदूर कार्य कर रहे थे।
ऐसे हादसों के बावजूद हिमालयी क्षेत्र के राज्यों की सरकारों ने कोई सबक नहीं सीखा है।
इन राज्यों में विकास के नाम पर बर्बादी की कहानी लिखी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा
कि कहा कि सरकारों का मकसद राजस्व बढ़ाना
नहीं बल्कि पर्यावरण को बचाना होना चाहिए खासकर ऐसे संवेदनशील इलाकों में।