
पीएम नरेंद्र मोदी की संभावित अमेरिका यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ऐसे समय में हो रही है
जब हाल के महीनों में भारत और अमेरिका के बीच संबंध प्रभावित हुए हैं।
पहले इन सम्बन्धों पर रूस-यूक्रेन की वक्र दृष्टि पड़ी
और फिर भारत-पाक सीमित संघर्ष और इजरायल-ईरान युद्ध की।
चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, या अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स
दोनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “टफ नेगोशिएटर”
यानी “कठोर वार्ताकार” बताते आए हैं।
इसका अभिप्राय एक ऐसे व्यक्ति से होता है जो बातचीत में आसानी से हार नहीं मानता
अपनी बात पर दृढ़ रहता है
और समझौते पर पहुंचने के लिए आसानी से झुकता नहीं है।
जब-जब मैं उन दोनों नेताओं के मुख से टंप नेगोशिएटर शब्द सुनता हूँ
तो महसूस करता हूँ कि आखिर इन अमेरिकियों के मन में चल क्या रहा है?
लेकिन अब उन बातों का जवाब मिल चुका है।
वह यह कि अमेरिका को चीन के मुकाबले एक मजबूत भारत नहीं
बल्कि पिछलग्गू भारत की जरूरत है।
वहीं, भारत विरोधी पाकिस्तान व बांग्लादेश को पुनः भड़काकर
अमेरिकी नेताओं ने मित्रता की आड़ में जो शत्रुतापूर्ण चालें चलीं हैं
उसके भी सही जवाब का उन्हें इंतजार करना होगा
क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी आजतक किसी के चतुराई भरे व्यवहार या दुर्व्यवहार
को कभी भूलते नहीं हैं और उचित वक्त आने पर सूद समेत ऐसा वापस करते हैं
जिसे दिग्गज नेता व उद्योगपति ज्यादा समझते हैं।
क्या पीएम नरेंद्र मोदी के सितंबर अमेरिकी दौरा से आपसी रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलेगी? समझिए मायने!
उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह अच्छा लग रहा है या बुरा।
दरअसल, यह बात मैं इसलिए कर रहा हूँ
कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी सितंबर माह में संयुक्त राष्ट्र महासभा
के एक उच्च स्तरीय सत्र को संबोधित करने के लिए
मित्र से शत्रु बनते जा रहे देश अमेरिका का अहम दौरा कर सकते हैं।
पीएम नरेंद्र मोदी की संभावित अमेरिका यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है
क्योंकि यह एक ऐसे समय में हो रही है जब हाल के महीनों
में भारत और अमेरिका के बीच संबंध प्रभावित हुए हैं।
पहले इन सम्बन्धों पर रूस-यूक्रेन की वक्र दृष्टि पड़ी और फिर भारत-पाक
सीमित संघर्ष और इजरायल-ईरान युद्ध की।
भारत-चीन की आंखमिचौली की बात अलग है।