पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का राजनीतिक सफर काफी घुमावदार रहा है। पंजाब
कांग्रेस को सत्ता दिलाने की कुंजी माने जाने वाले कैप्टन को राजीव गांधी ने 1980 में लोकसभा चुनाव
लड़वाया था। शाही परिवार से होने के नाते चुनाव में उन्हें जीत प्राप्त हुई। श्री हरिमंदिर साहिब में जब
सेना ने सशस्त्र चरमपंथियों को बाहर निकालने के लिए धावा बोला तो कैप्टन ने इसके विरोध में
सांसद पद से और कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। फिर 1985 में शिअद में शामिल हो
गए।पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का राजनीतिक सफर काफी घुमावदार रहा है।
पंजाब कांग्रेस को सत्ता दिलाने की कुंजी माने जाने वाले कैप्टन को राजीव गांधी ने 1980 में लोकसभा
चुनाव लड़वाया था। शाही परिवार से होने के नाते चुनाव में उनकी जीत हुई। श्री हरिमंदिर साहिब में जब
सेना ने सशस्त्र चरमपंथियों को बाहर निकालने के लिए धावा बोला तो कैप्टन ने विरोध में इस्तीफा दे दिया।
जब शिरोमणि अकाली दल में शामिल हुए थे कैप्टन
साल 1992 में शिअद छोड़कर अकाली दल (पंथक) नाम से पार्टी बनाई, जिसका 1998 में कांग्रेस में
विलय कर दिया। साल 2021 में कैप्टन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ दे अपनी पार्टी बनाई। कुछ समय
बाद भाजपा में शामिल हुए और पार्टी का विलय कर लिया। बता दें कि कैप्टन ने दो बार पंजाब के
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। पहली बार वह 2002 से 2007 तक रहे तो दूसरी बार 2017 से 2021
तक रहे। साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद पंजाब के तीन लोकसभा क्षेत्र फिल्लौर, तरनतारन
और रोपड़ को समाप्त कर दिया गया था। इनकी जगह आनंदपुर साहिब, फतेहगढ़ साहिब और खडूर
साहिब नए संसदीय क्षेत्र बनाए गए थे। परिसीमन के बाद बठिंडा को सामान्य और जालंधर व
फरीदकोट को आरक्षित सीट का दर्जा दिया गया था।परिसीमन के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस आठ,
शिअद चार और भाजपा ने एक सीट पर जीत हासिल की थी।
