भारत चाहता है यह युद्ध का नहीं, शांति का दौर बने
भारत की
शांति नीति केवल रूस-यूक्रेन युद्ध तक सीमित नहीं रही है।
चाहे ईरान-इजरायल, इजरायल-हमास युद्ध हो, अफगानिस्तान का संकट हो
या मध्य पूर्व की उथल-पुथल-भारत ने हमेशा संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है।
दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है
जहां युद्ध और हिंसा ने सभ्यता की प्रगति को खतरे में डाल दिया है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष इसके ताजे उदाहरण के रूप में हमारे सामने है।
इस युद्ध ने न केवल यूरोप की स्थिरता को हिलाकर रख दिया है
बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है।
हजारों लोग मारे गए, लाखों लोग शरणार्थी बने और ऊर्जा तथा खाद्यान्न संकट
ने विकासशील देशों को प्रभावित किया।
ऐसे कठिन समय में भारत ने अपनी पारंपरिक नीति-अहिंसा, निशस्त्रीकरण
और अयुद्ध का परिचय कराते हुए यह स्पष्ट किया है
कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
यूक्रेन के राष्ट्रपति बोलोदिमीर जेलेंस्की को भारत आने का निमंत्रण देकर भारत ने संकेत दिया है
कि युद्ध विराम एवं शांति समझौता कराने में भारत सक्रिय भूमिका निभा सकता है
निश्चित ही इस कदम का स्वागत होना चाहिए।
भारत चाहता है यह युद्ध का नहीं, शांति का दौर बने
तो यह पूरी दुनिया के हित में होगा, इससे यु़द्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला होगा।
भारत द्वारा यूक्रेन के राष्ट्रपति को भारत आने का निमंत्रण देना
केवल शांति प्रयासों का हिस्सा ही नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की चालों को करारा जवाब देने वाला
एक कूटनीतिक कदम भी है।
हाल के दौर में अमेरिका ने भारत पर ट्रेड टैरिफ लगाकर
और विभिन्न आर्थिक दबाव बनाकर उसकी अर्थव्यवस्था को अस्थिर एवं अस्तव्यस्त करने
की कोशिश की है। किंतु मोदी सरकार ने अपनी दृढ़ कूटनीति से यह संदेश दिया है
कि भारत अब किसी दबाव में आने वाला नहीं है। ज़ेलेन्स्की को आमंत्रित कर भारत ने यह दिखा दिया
कि वह रूस और यूक्रेन दोनों के साथ संवाद रखकर स्वतंत्र नीति अपनाने में सक्षम है
और अमेरिका की अपेक्षाओं के आगे झुकने के बजाय
अपनी शांति और संतुलन की राह पर आगे बढ़ रहा है।
यह कदम भारत की आत्मनिर्भर, साहसी और वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका का प्रमाण है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है-‘यह युद्ध का दौर नहीं है।
यह वाक्य केवल एक कूटनीतिक कथन नहीं, बल्कि भारत की शाश्वत नीति
और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।