संसद संवाद और बहस का मंच है, हंगामे का नहीं
लोकसभा के
मानसून सत्र के लिए कुल 120 घंटे चर्चा के लिये निर्धारित थे, लेकिन कार्यवाही मात्र 37 घंटे ही चल पाई।
यानी 70 प्रतिशत से अधिक समय लोकसभा में और 61 प्रतिशत से ज्यादा समय राज्यसभा
में हंगामे और शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान उसकी संसद होती है। संसद वह संस्था है
जहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि राष्ट्र की नीतियों, योजनाओं और कानूनों पर विचार-विमर्श करते हैं।
यह वह सर्वाेच्च मंच है जहाँ विभिन्न विचारधाराएं और दृष्टिकोण टकराते हैं
और देशहित में समाधान निकलता है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज भारतीय संसद की छवि हंगामे
तोड़फोड़, शोर-शराबे और गतिरोध का पर्याय बनती जा रही है।
हाल ही में संपन्न मानसून सत्र इसकी बानगी था, जो आरंभ से अंत तक त्रासद हंगामे की भेंट चढ़ गया।
यह सत्र बेहद निराशा एवं अफसोसजनक रहा
क्योंकि सरकार और विपक्ष में टकराव उग्र से उग्रत्तर हुआ।
राज्यसभा में केवल 41.15 घंटे और लोकसभा में 37 घंटे काम हुआ।
संवाद एवं सौहाई की कमी दिखी, कई सवाल अधूरे रहे, जिनका जवाब देश जानना चाहता था।
संसद संवाद और बहस का मंच है, हंगामे का नहीं
लेकिन देशहित को दोनों पक्षों ने नेस्तनाबूद किया।
यह स्थिति केवल दुखद ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय भी है।
लोकसभा के मानसून सत्र के लिए कुल 120 घंटे चर्चा के लिये निर्धारित थे
लेकिन कार्यवाही मात्र 37 घंटे ही चल पाई। यानी 70 प्रतिशत से अधिक समय लोकसभा
में और 61 प्रतिशत से ज्यादा समय राज्यसभा में हंगामे और शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया।
संसद में बिताया गया प्रत्येक घंटा जनता के करोड़ों रुपये की कमाई से संचालित होता है।
जब वही समय व्यर्थ हो जाए तो यह सीधे-सीधे जनता के साथ अन्याय है।
गुजरात के एक निर्दलीय सांसद ने यह प्रश्न उठाया भी कि जो सांसद हंगामा कर सदन को ठप कर देते हैं
क्या वे जनता के धन की बरबादी की भरपाई करेंगे? यह प्रश्न केवल प्रतीकात्मक नहीं
बल्कि लोकतंत्र के प्रति हमारी गंभीरता की कसौटी भी है।
काम कम, हंगामा अधिक-आखिर हमारे राजनीतिक दल एवं जनप्रतिनिधि लोकतंत्र
की मर्यादा एवं आदर्श को तार-तार करने पर क्यों तुले हैं? कैसी विडम्बना है
कि लोकसभा की कार्यवाही के लिए 419 तारांकित प्रश्न शामिल किए गए थे
और इनमें से महज 55 का मौखिक उत्तर मिल सका।