रामजन्मभूमि आंदोलन भारत के इतिहास में एक निर्णायक और परिणामकारी घटना सिद्ध हुई

Ram Mandir Movement

श्री नरेंद्र मोदी अयोध्या के दिव्य मंदिर में श्रीराम के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे

मैं शब्दातीत प्रफुल्लित हूँ कि हम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में एक भव्य
श्रीराम मंदिर बनाने के मेरे सबसे प्रिय सपने को साकार होता देखने वाले हैं।
22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अयोध्या के
दिव्य मंदिर में श्रीराम के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे। मैं धन्य हूँ कि
मैं अपने जीवनकाल में इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनूँगा।

श्रीराम भारत की आत्मा के प्रतीक है।

भारत और भारतीयता की सच्ची आत्मा अनुशासन, सच्चाई, सत्यनिष्ठा, नैतिकता,

नैतिक मूल्य, विविधता को स्वीकार करना और उस पर गर्व करना,

बड़ों के प्रति सम्मान, सुदृढ़ पारिवारिक संबंध और ऐसे सभी उत्कृष्ट मानवीय मूल्य है;

रामजन्मभूमि आंदोलन भारत के इतिहास में एक निर्णायक घटना सिद्ध हुई

अयोध्या में श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए किया गया ‘रामजन्मभूमि

आंदोलन’ 1947 के बाद के भारत के इतिहास में एक निर्णायक और परिणामकारी घटना सिद्ध हुई।

हमारे समाज, राजनीति तथा राष्ट्रीय पहचान की भावना पर इसका गहरा प्रभाव रहा है।

मैंने सदैव कहा है कि मेरी राजनीतिक यात्रा में अयोध्या आंदोलन सबसे

निर्णायक परिवर्तनकारी घटना थी, जिसने मुझे भारत को पुनः

जानने और इस प्रक्रिया में अपने आप को भी फिर से समझने का अवसर दिया।

मध्य काल में सोमनाथ अनेक विदेशी आक्रांताओं के निशाने पर रहा

और उनके आक्रमणों का साक्षी भी रहा, तथा सोमनाथ मंदिर का

पुनर्निर्माण अपने खोए सांस्कृतिक गौरव को वापस पाने और

धर्मांध विदेशी आक्रांताओं के इतिहास को मिटाने के

भारत के दृढ़ संकल्प का एक गौरवपूर्ण प्रमाण है

1528 में बाबर अयोध्या में एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया,

ताकि उस स्थान को ‘फरिश्तों के अवतरण का स्थान बनाया जा सके, इसलिए इसका नाम बाबरी मस्जिद पड़ा।

यह सभी मानते हैं और बाद में पुरातात्त्विक साक्ष्यों से इसकी पुष्टि भी हो गई कि

अयोध्या में पहले से ही एक मंदिर था, जिसे मस्जिद की स्थापना के लिए ध्वस्त कर दिया गया था।

इस कारण, कई अर्थों में अयोध्या आंदोलन ने सोमनाथ की भावना को ही आगे बढ़ाया।

12 सितंबर, 1990 को मैंने 11 अशोक रोड, नई दिल्ली स्थित पार्टी

मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और 10,000 किलोमीटर

लंबी रथयात्रा करने के अपने निर्णय की घोषणा की।

यात्रा 25 सितंबर को सोमनाथ से आरंभ होकर 30 अक्तूबर को अयोध्या पहुँचने वाली थी,

जहाँ आंदोलन से जुड़े संतों की योजना के अनुसार कारसेवा की जानी थी।

25 सितंबर मेरे लिए विशेष था, क्योंकि इस दिन पं. दीनदयाल उपाध्यायजी की जयंती है।

अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश मेरा जीवन’ में मैंने 1990 में

अयोध्या आंदोलन और श्रीराम रथयात्रा के विषय में विस्तार से चर्चा की है

आज के इस विशेष अवसर पर में इसके कुछ महत्त्वपूर्ण अंशों को याद दिलाना चाहूँगा।

25 सितंबर, 1990 की सुबह मैंने सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना की।

मेरे साथ वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी (जो उस समय भाजपा के एक होनहार नेता थे),

श्री प्रमोद महाजन (जो पार्टी के महासचिव थे), गुजरात में पार्टी के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी

और मेरे परिवार के सदस्य थे। पार्टी के दो उपाध्यक्ष राजमाता विजयाराजे सिंधिया और

श्री सिकंदर बख्त रथ को हरी झंडी दिखाने आए थे।

यह जनसमर्थन महाराष्ट्र के साथ-साथ उसके बाद के सभी राज्यों में भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया,

जहाँ-जहाँ से यात्रा गुजरी। जगह-जगह लोगों ने भव्य तोरणद्वार बनाकर

और पुष्पवर्षा करके रथ का स्वागत किया। मेरे लिए सबसे आश्चर्यजनक दृश्य वह था,

जिसमें लोग, विशेष रूप से महिलाएँ, रथ के आगे आकर आरती करती थीं और

सिक्के चढ़ाती थीं, जैसे कि वे किसी मंदिर में प्रार्थना कर रही हों।

रामजन्मभूमि आंदोलन भारत के इतिहास में एक निर्णायक घटना सिद्ध हुई

मुझे शीघ्र ही अनुभव हुआ कि अनेक लोगों के लिए

इस बिंदु पर मैं उस ‘रथ’ के विषय में कुछ कहना चाहूँगा,

जिसमें मैंने यात्रा की थी। वह वास्तव में एक मिनी ट्रक था,

जिसे रथ का आकार देने के लिए रीडिजाइन किया गया था

और इसमें मूलभूत सुविधाएँ प्रदान की गई थीं।

मेरे भाषण, जो अधिकतर वाहन पर विशेष रूप से बनाए गए

ऊँचे मंच से दिए जाते थे, लगभग पाँच मिनट के ही होते थे,

क्योंकि मुझे हर दिन सड़क किनारे ऐसे लगभग बीस से पच्चीस स्वागत समारोहों को

संबोधित करना पड़ता था। अधिकांश कस्बों और शहरों में, मुझे नीचे उतरकर

सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करना पड़ता था, जिसमें हजारों लोग शामिल होते थे।

मैं यात्रा के उद्देश्य और उन परिस्थितियों के बारे में बताता था,

जिन्होंने भाजपा को रामजन्मभूमि आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के

लिए विवश किया था। हालाँकि रथयात्रा पर लोगों की प्रतिक्रिया मुख्य रूप से धार्मिक थी,

जबकि मेरे भाषणों का बल राष्ट्रवाद पर था, क्योंकि मेरा हमेशा से मानना रहा है कि

श्रीराम मंदिर का मुद्दा आंतरिक रूप से हमारी भारतीयता की भावना से जुड़ा है

यह वह समय था, जब मोबाइल फोन नहीं थे। मेरी गिरफ्तारी की खबर

मेरी बेटी प्रतिभा तक बड़े दिलचस्प ढंग से पहुँची, जो उस समय कोलकाता में थी।

वह अपने घर वापस जाने के लिए टैक्सी की प्रतीक्षा में थी, तभी एक

टैक्सी ड्राइवर ने उनसे कहा कि वह झटपट सवार हो जाएँ।

जब प्रतिभा ने उनसे पूछा कि वह ऐसा क्यों कह रहे हैं, तो टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें बताया कि

आडवाणी ‘बाबा’ को गिरफ्तार कर लिया गया है और लोगों को डर था कि शहर में दंगे हो सकते हैं!

मेरी श्रीराम रथयात्रा को 33 वर्ष हो गए हैं।

तब से बहुत कुछ घटित हुआ, इसमें वो कानूनी लड़ाई भी शामिल है,

जिसमें मुझ पर तथा विश्व हिंदू परिषद्, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और

भारतीय जनता पार्टी के मेरे कई सहयोगियों पर मुकदमा चलाया गया।

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